Domestic Violence: क्या महिलाओं के प्रति इस अपराध की जड़ें आपके घर में भी हैं, जानिए कैसे?

Domestic Violence: क्या महिलाओं के प्रति इस अपराध की जड़ें आपके घर में भी हैं, जानिए कैसे?

भारत विवधताओं से संपन्न देश है, जहाँ सदियों से, बौद्ध, हिंदु, मुसलमान, जैन, सिख और विभिन्न जनजातीय आबादी के बीच संस्कृतियों का एक महत्वपूर्ण संलयन रहा है। 2011 की रिपोर्ट के अनुसार भारत की आबादी 125.03 करोड़ थी, तब से लेकर अभी तक देश की आबादी काफी तेज़ी से बढ़ी है, स्टेटिस्टिक्स टाइम्स (Statistics Times) की रिपोर्ट के हिसाब से भारत की आबादी 140 करोड़ हो चुकी है. जैसे-जैसे भारत की आबादी बढ़ रही है, ठीक उसी तरह अपराध भी बढ़ रहा है.

भारत में पिछले कुछ सालों में अपराध में बढ़ोतरी भी दर्ज की गयी है. फिर चाहे वो महिलाओं या बच्चों के प्रति हो या अन्य किसी भी तरह का जगन्य अपराध हो. महिलाओं की बात करें तो उनके प्रति हो रहे अपराध में भी काफी बढ़ोतरी दर्ज करी गयी है, 2020 के मुकाबले 2021 में 15.3% की बढ़ोतरी हुई है, जो की बिलकुल भी ठीक नहीं है, एक महिला सबसे ज्यादा असुरक्षित कब महसूस करती है, ज़ाहिर है जब वह घर से बाहर होती है. 

यह जानकर आपको हैरानी होगी की पिछले कुछ सालों में भारत में महिलाओं के साथ बाहर के मुकाबले घरेलू हिंसा ज्यादा हुई यानी उनके साथ हिंसा करने वाला कोई बहार का व्यक्ति नहीं बल्कि खुद के घर का कोई सदस्य या फिर कोई रिश्तेदार ही था. भारत में घरेलू हिंसा की जड़ें बहुत गहरी हैं और यह व्यापक रूप से प्रचलित है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) 2019 की रिपोर्ट है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के सभी 4.05 लाख मामलों में से अधिकांश मामले 30.9% भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498 ए के तहत दर्ज हैं। यह धारा किसी औरत पर उसके पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता किए जाने पर लगायी जाती है।    

महिला राष्ट्रीय आयोग (NCW) की 2021 की रिपोर्ट के हिसाब से 30,856 मामलों की शिकायतें उसके पास आयीं जिसमें से 15,828 के करीब कम्प्लेन अकेले उत्तर प्रदेश से ही थी. इस वर्ष भी 9,800 कम्प्लेन आयोग के पास आयीं जिसमे से 4,876 कम्प्लेन उत्तर प्रदेश से ही थी. सम्मान और समानता के साथ जीने का अधिकार इस देश में सबके लिए है जो इस देश का संविधान सभी को बराबरी से देता है, फिर ऐसी क्या वजह है की शाम होते-होते इस देश की 48.5% महिला आबादी कर्फ्यू में चली जाती है, समय भले ही बदल गया हो लेकिन आज भी देश भर के कई हिस्सों में एक लड़की अपनी मर्ज़ी से घर से बाहर तक नहीं जा सकती जिसकी वजह कुछ और नहीं बल्कि हमारे समाज की रुड़ीवादी मानसिकता है.


कुशाग्र उपाध्याय