भारतीय शिक्षा प्रणाली व नयी शिक्षा नीति
2014 में जब भाजपा की सरकार बनी थी तब उन्होंने अपने मैनिफेस्टो में यह उल्लेख किया था की वे नयी शिक्षा नीति लाएंगे जिसके चलते अक्टूबर, 2015 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत समिति का गठन किया गया था. उस वक्त श्री स्मृति ईरानी (Smriti Irani) मानव संसाधन विकास मंत्री हुआ करतीं थी. इस समिति को नयी शिक्षा नीति बनाने का कार्य सौंपा गया था, जिसके अध्यक्ष थे श्री टी.एस.आर सुब्रमण्यम (T.S.R Subrmanyam)। समिति ने अपनी रिपोर्ट 7 मई 2016 को बनाकर सरकार के सामने पेश की, उस वक्त जो सुझाव इस समिति ने सरकार को दिए या जो नीतियां बनायीं वो सरकार ने एक्सेप्ट नहीं की, इसके बाद 2016 में ही सरकार ने नयी समिति का गठन किया जिसके अध्यक्ष थे डॉ. के.कस्तूरीरंगन (Dr. K. Kasturirangan) जो 1994 से लेकर 2003 तक इसरो के चीफ भी रह चुके हैं. इस समिति ने 31 मई 2019 को एक ड्राफ्ट प्रोपोज़ किया सरकार के हिसाब से जिसे करीब 1.5 लाख सुझाव लेने के बाद एक्सेप्ट कर लिया गया. वहीं नयी शिक्षा नीति का एक पहलु यह भी है की 2020 तक इसका फुल ड्राफ्ट तैयार ही नहीं था मानव संसाधन विकास मंत्रालय (MHRD) की साइट पर बस 66 पन्नो का एक डॉक्यूमेंट उप्लोडेड था, जो नयी शिक्षा नीति की समरी भर थी. एम जगदीश कुमार (M.Jagdish Kumar) जो यूजीसी (UGC) के चेयरमैन हैं, उन्होंने कोविड-19 (Covid-19) का हवाल देते हुए कहा की महामारी के चलते नयी शिक्षा नीति के कार्यान्वयन में देरी हुई. भारत के अंदर शिक्षा कितनी अच्छी है यह हम सभी को पता है, पार्टियां चुनावों के चलते जब रैलियां करती हैं, तब कवीड-19 का न तो किसी को डर होता है और ना ही रैली में आये लोगों की चिंता। आज से 2 वर्ष पहले तक यह पॉलिसी एक ड्राफ्ट भर था. सरकार ने अपने मैनिफेस्टो में वादा किया था की वे नयी शिक्षा नीति लेकर आएंगे जिसका ड्राफ्ट बनाने में ही उन्हें 6 वर्ष लग गए अभी इसे पार्लियामेंट में भी जाना है, जहाँ इसे दोनों सदनों में रखा जाएगा फिलहाल के लिए यूनियन कैबिनेट ने नयी शिक्षा नीति 29 जुलाई 2020 को ही मंजूरी दे दी थी, यह हमारी पुरानी 1986 की शिक्षा नीति की जगह लेगी।
शिक्षा के छेत्र में हमारे देश के अंदर मंत्रालय का नाम बदलने से ज्यादा कोई बड़ा काम नहीं हुआ है, जब देश आज़ाद हुआ था तब मंत्रालय का नाम एजुकेशन मिनिस्ट्री ही था, जिसे राजीव गाँधी की सरकार में बदलकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय कर दिया गया और बाद में नरेंद्र मोदी की सरकार में वापिस एजुकेशन मिनिस्ट्री कर दिया गया इसके पीछे ऐसी कौन सी मुख्य वजह थी यह कोई नहीं जानता। इसके अलावा एक बात यह भी है, की कोई बाध्यता नहीं है की किसी चीज़ का अगर वादा करा गया है, तो उसे तत्काल प्रभाव से लागू होना चाहिए हर मंत्री-नेता अपनी सुविधा अनुसार नीतियां बनाता है और अगर सही लगता है तो लागू भी होती हैं वरना नहीं। किसी भी देश का एजुकेशन सिस्टम उस देश की रीढ़ होता है. भारत जैसा देश जहाँ की 66 प्रतिशत आबादी नौजवानों की है वहां शिक्षा का क्या महत्व है, ये हमारे नेता नहीं समझते जिमी कार्टर जो अमेरिका के राष्ट्रपिता थे वे अपनी बेटी को सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए भेजते थे, लेकिन भारत में परिस्थिति दूसरी है यहाँ हर बड़ा या छोटा नेता अपने बच्चों को अच्छे और बड़े स्कूलों में भेजना चाहता है, ताकि जब वे बड़े हों, तब उन्हें हायर एजुकेशन के लिए विदेश भेज सकें।
कुशाग्र उपाध्याय
Sandhya Halchal News