चुनाव में राजनीतिक पार्टियों के लुभावने वादों पर लगेगा अंकुश: सुप्रीम कोर्ट

चुनाव में राजनीतिक पार्टियों के लुभावने वादों पर लगेगा अंकुश: सुप्रीम कोर्ट

चुनावों में जनता को लुभाने के लिए राजनीतिक पार्टियों (Political Parties) के तरह-तरह के लुभावने वादों को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बुधवार को ख़ास टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में दायर एक याचिका (Petition) की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान 'मुफ्त उपहार' देने के वादे करना व ऐसे मुफ्त उपहार देना एक गंभीर आर्थिक समस्या है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का कहना है कि इस पर अंकुश लगाना जरूरी है सरकार व चुनाव आयोग ये कह कर किनारा नहीं कर सकते की वे कुछ नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग और सरकार के साथ ही कांग्रेस नेता और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल (kapil Sibbal) से भी सुझाव मांगे हैं। 

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय (Ashwini Upadhyay) ने अर्जी दाखिल कर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को प्रतिवादी बताया है। अर्जी में कहा गया है कि "पब्लिक फंड से चुनाव से पहले वोटरों को लुभाने के लिए मुफ्त उपहार देने का वादा करने या मुफ्त उपहार बांटना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के खिलाफ है। यह वोटरों को प्रभावित करने और लुभाने का प्रयास है। इससे चुनाव प्रक्रिया खराब होती है। इससे चुनाव मैदान में एक समान अवसर के सिद्धांत प्रभावित होते हैं। याचिकाकर्ता ने कहा कि राजनीतिक पार्टियों की ओर से मुफ्त उपहार देने और वादा करना एक तरह की रिश्वत है। चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाना चाहिए कि वह सुनिश्चित करे कि राजनीतिक पार्टियां इस तरह के वादे न करे"।

चीफ जस्टिस एनवी रमना (CJI N.V Ramana), जस्टिस कृष्ण मुरारी (Justice Krishna Murari) और जस्टिस हिमा कोहली (Justice Hima Kohli) की बेंच ने कहा कि नीति आयोग, वित्त कमीशन, सत्ताधारी विपक्ष पार्टियों, आरबीआई और अन्य संस्थाओं को भी इस मामले में सुझाव देने चाहिए कि आखिर इस 'रेवड़ी कल्चर' को कैसे रोका जा सकता है। 
वहीं सुप्रीम कोर्ट ने एक एक्सपर्ट बॉडी बनाने के लिए सात दिनों के अंदर सुझाव मांगे हैं। कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग के साथ ही कांग्रेस के सांसद कपिल सिब्बल और याचिकाकर्ताओं से कहा है कि वे जल्द अपने सुझाव दें ताकि इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए एक एक्सपर्ट बॉडी बनाई जा सके। 

दूसरी ओर केंद्र सरकार की तरफ से कोर्ट में पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Tushar Mehta) ने मुफ्त की योजनाओं के चुनावी वादों के खिलाफ दायर याचिका का समर्थन करते हुए कहा कि इससे अर्थव्यवस्था (Economy) को बड़ा नुकसान हो रहा है। अगर इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो इससे देश की आर्थिक स्थिति बदतर हो सकती है। तब चीफ जस्टिस (CJI) ने कहा कि चुनाव आयोग ने तो हाथ खड़े कर दिए हैं। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इस मामले में दोबारा चुनाव आयोग को विचार के लिए कहा जा सकता है। तब चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में गाइडलाइंस बनाने को कहा था।

सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल (Kapil Sibbal) ने कहा कि मिड डे मील, गरीबों को राशन और फ्री बिजली जैसी सुविधाएं वेलफेयर का काम है। इस तरह इस मामले में एकतरफा रोक भी नहीं हो सकता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम बिना तमाम हित धारकों के सुझाव के आदेश नहीं करेंगे। चीफ जस्टिस ने कहा कि "हम गाइडलाइंस जारी नहीं करने जा रहे हैं, बल्कि मामले में हितधारकों के सुझाव जरूरी है। आखिर में चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को मामले में फैसला लेना होगा। रिपोर्ट उन्हीं को दी जा सकती है। केंद्र और चुनाव आयोग यह नहीं कह सकते हैं कि वह कुछ नहीं कर सकते"।

महिमा शर्मा